از حــبــاب آمـوز هـمـت را کـه بــا صــد احــتــیـاجخـــالـــی از دریـــا بـــرون آرد ســـبـــوی خـــویـــش را***خــضــر نــتــوانــد بــه آب زنــدگــ…
| از حــبــاب آمـوز هـمـت را کـه بــا صــد احــتــیـاج | خـــالـــی از دریـــا بـــرون آرد ســـبـــوی خـــویـــش را |
| *** | |
| خــضــر نــتــوانــد بــه آب زنــدگــی از مــا خــریـد | مـــنــصـــب مــیــرابـــی ســـرچـــشـــمــه آیــیــنــه را |
| *** | |
| هـمـه تــن شـانـه صـفـت پــنـجـه گـیـرا شـده ام | بـــه امــیــدی کــه فـــتـــد زلــف تـــو در چـــنــگ مــرا |
| *** | |
| دانش آن راسـت مسـلم که بـه تـردسـتـی شرم | گـــرد خـــجـــلــت ز جـــبـــیــن پـــاک کـــنــد آیــنــه را |
| *** | |
| چـه حـاجـت اسـت بـه مـی لـعـل سـیررنـگ تـرا؟ | نــظــر بــه پــرتــو خــورشــیـد نــیـســت ســنــگ تــرا |
| *** | |
| فــــزود تـــــیــــرگــــی خــــاطــــر از ایــــاغ مــــرا | بــــنـــفـــشـــه گـــل کـــنـــد از لـــالـــه چــــراغ مـــرا |
| *** | |
| در خــوش قــمــاشــی از بــر رو دســت بــرده ام | بــــاریـــک شـــو مـــشـــاهـــده کـــن تــــار و پــــود را |
| *** | |
| بــاغـبــان بــیـرون کـن ایـن گـسـتــاخ بــادآورده را | خــوش نـمـی آیـد بــه گــل ایـن هـایـهـای عــنـدلـیـب |
| *** | |
| عـیش در زیر فـلک بـا خـاکسـاران مشـکل اسـت | شــهــد نــتـــوان در مــیــان خـــانــه زنــبـــور ریــخــت |
| *** | |
| روز مــحــشــر ســرخ رویــی از خــدا دارم امــیــد | نـامــه اعــمــال مــن صــائب بــه مـهـر کــربــلــاســت |
| *** | |
| گـرچــه دسـت سـرو کـوتــاه اسـت از دامـان گـل | ســرو بــالـایـی کـه مـا داریـم ســر تــا پــا گـل اســت |
| *** | |
| آن کــه بـــی شــیــرازه دارد کــهــنــه اوراق مــرا | بـــارهــا شـــیــرازه دیــوان مــحـــشـــر کــرده اســـت |
| *** | |
| از رمـیـدن هـا خـیـال چــشـم آن وحــشـی غـزال | ســیـنـه تــنــگ مــرا دامــان مــحــشــر کــرده اســت |
| *** | |
| نـیـسـت هـر چـنـد از لـبـاس گـل جـدایی رنـگ را | جـــامــه گـــلـــرنــگ بـــر انــدام او زیــبـــنــده اســـت |
| *** | |
| چـشـم خـود را داده بــود از آب حـیـوان خـضـر آب | تـــا غــرور آیــیــنــه را از دســـت اســکــنــدر گــرفــت |
| *** | |
| چــاک در پــیــرهــن یــوســف عــقــل افــکــنــدن | چـشـمه کاری اسـت که در دسـت زلیخـای دل اسـت |
| *** | |
| نـیـســت ســودی کــه زیـانـش نــبــود در دنـبــال | بــار مــی بــنــدم ازان شــهــر کــه بــازاری نــیـســت |
| *** | |
| بـــه گــرد دامــن مــنــزل کــجــا رســی صــائب؟ | چــنـیـن کــه عــزم تــرا پــای ســعــی در بــنــدســت |
| *** | |
| شـکـسـتـه رنگـی من بـا طـبـیب در جـنگ اسـت | عــلــاج دردســرم حـــســن صــنــدلــی رنــگ اســـت |
| *** | |
| تــلـاش بــیـهـده ای مـی کــنـد ســر خــورشــیـد | سـتـاده (فتـاده؟) اسـت بـلند، آستـان حـضرت دوست |
| *** | |
| چـــو داغ لــالــه مــرا در حـــدیــقــه هــســـتـــی | بــــه پــــاره دل و لـــخـــت جـــگـــر مـــدار گـــذشـــت |
| *** | |
| شــیـریـنـی نـشــاط، جــهـان را گـرفــتــه اســت | صـــبــــح از هـــوای تــــر شـــکـــر آب دیـــده اســــت |
| *** | |
| عــکــس رخ تـــو آیــنــه را چــون نــگــار بـــســت | بـــر گــرد شــهــر حـــســن ز آهــن حــصــار بـــســت |
| *** | |
| مـوجــی اســت کـه تــاج از ســر فـغــفـور ربــایـد | چــیـنـی کـه در ابــروی تــو ای تــلـخ جــبــیـن اســت |
| *** | |
| کــاکــل چــه گـنـه دارد، دســتــش ز قــفــا واکـن | هـر فــتــنـه کــه مـی بــیـنـم در زیـر ســرزلـف اســت |
| *** | |
| بـــــــه فــــــریــــــب کــــــســـــــی ز راه مــــــرو | یـــــوســــــف مــــــن، اگــــــر بــــــرادر تــــــوســــــت |
| *** | |
| آرزوی بـوسـه شـسـتـه اسـت از دلم پـیغـام تـلخ | زان قــنـاعــت کــرده ام از بــوســه بــا دشــنـام تــلـخ |
| *** | |
| از نظـر رفـتـی بـه راهت چـشـم حـیران بـاز مـانـد | آنـــقـــدر مـــرغ نــگـــه پـــر زد کـــه از پـــرواز مـــانـــد |
| *** | |
| تـخـم نـیـکـی را زمـیـن پـاک، اکـسـیـر بــقـاسـت | قــطــره آبــی کــه نـوشــد تــیـغ، جــوهـر مـی شــود |
| *** | |
| سـهـل بـاشـد بـنـد کـردن نـاخـنـی در بـیـسـتـون | پــیـش بــرق تــیـشــه مــن کــوه مــیـدان مــی دهــد |
| *** | |
| بـه فـریاد کـس از خـواب صـبـوحـی بـرنمی خـیزد | مــگــر بـــر دســت و پـــای آن پــریــرو آفــتــاب افــتــد |
| *** | |
| در آن گـلشـن کـه آید در سـخـن لعـل گـهربـارش | ز شـبــنـم آب حـسـرت غـنـچــه هـا را در دهـان گـردد |
| *** | |
| بهای بوسه اش سر می دهم چون زر نمی گیرد | خــیـالـی کـرده ام بــا خــویـش امـا ســر نـمـی گـیـرد |
| *** | |
| ز ابـرو یـک سـر و گـردن بـلـنـد افـتـاده مـژگـانـش | کــمـان پــرزور چــون افــتــد خــدنـگ او رســا بــاشــد |
| *** | |
| مـرغ حــســن از قـفــس خــط ســیـه تــنـگ آمـد | پــــر بـــــرآورد (و) کــــنــــون شــــوق پــــریــــدن دارد |
| *** | |
| آرزو خــار و خــســی نــیــســت کــه آخــر گــردد | ورنــه بـــا شــعــلــه خــوی تــو کــه بــس مــی آیــد؟ |
| *** | |
| نــفـــس شـــمــرده زن ای بـــلــبـــل نــوا پـــرداز | کـــه رنـــگ گـــل بـــه نـــســـیــم بـــهــار بـــرخـــیــزد |
| *** | |
| ز بــرگ پــان لــب جــانـان عــقــیـق پــیـمــا شــد | حـنـای عـیـدمـی (ظ: مـن) از بـهـر بــوسـه پـیـدا شـد |
| *** | |
| شــود ســـعــادت دولــت نــصــیــب اهــل قــلــم | هـــمـــا ز کـــوچـــه ایـــن اســـتـــخـــوان بـــدر نـــرود |
| *** | |
| جــمـعــی کــه زیـر چــرخ شــبــی روز کــرده انـد | چــون شـمـع، دل خــنـک بــه نـسـیـم ســحــر کـنـنـد |
| *** | |
| تـــا شـــرم داشـــت مــنــصـــب آیــیــنــه داریــت | گـــردانـــدن لـــبــــاس تـــو تــــغـــیـــیـــر رنـــگ بــــود |
| *** | |
| دلـبــر چــه زود خــط بــه رخ دلـســتــان کـشــیـد | خــطــی چــنـان لـطــیـف بــه مـاهـی تــوان کــشــیـد |
| *** | |
| در پــــرده نـــمـــود از عـــرق شـــرم تــــلـــافـــی | در ظـــاهـــر اگـــر روی تــــو آتــــش بــــه جـــهـــان زد |
| *** | |
| شـد سـیه روز من از چـشم کبـود او، که هسـت | شــعــلــه نـیـلــوفــری از شــعــلــه هـا جــانـســوزتــر |
| *** | |
| سیه گر کرد روزم چـشم او، خـود هم کشید آخـر | مــکــافــات عــمــل را در لــبـــاس ســرمــه دیــد آخــر |
| *** | |
| صــائب ز فــکــرهــای گــلــوســوز مــن نــمــانــد | جـــــا در بـــــیـــــاض گـــــردن خـــــوبــــــان روزگـــــار |
| *** | |
| بــا بــد و نـیـک جـهـان در دشـمـنـی یـکـرو مـکـن | تـیـغ چـون خـورشـیـد تـابــان بــر هـمـه عـالـم مـکـش |
| *** | |
| ز شـوخـی هـا بـه بـرق نـوبـهاران نـسـبـتـی دارد | که می ریزد چو باران خون و خندان است شمشیرش |
| *** | |
| تــشـنـه مـعـنـی تــازه اسـت مـرا ســاغـر گـوش | نـــتـــوان کـــرد مـــرا خـــواب بـــه افـــســـانـــه خـــط |
| *** | |
| مـکـن بــه حـرف طـمـع تـیـره زنـدگـانـی خـویـش | کـــه روز هـــم شـــب تـــارســـت بـــر گـــدای چـــراغ |
| *** | |
| نـکـنـد هـیـچ یـتــیـم بــه عـسـس سـاخــتــه ای | مــی کـــنــد آنــچـــه در گــوش تـــو در ســـایــه زلــف |
| *** | |
| افــتــادگــی گــزیـن کــه دهـد فــیـض بــیـشــتــر | پـهـلـوی خـویـش هـر کـه نـهـد چـون سـبــو بـه خـاک |
| *** | |
| نفـس در سـینه بـاد خـزان می سـوخـت نومیدی | چـــراغ گـــل اگـــر مـــی بـــود در زیـــر پـــر بـــلـــبـــل |
| *** | |
| هر کسی چیزی ز اسبـاب جهان بـرداشتـه است | مــن هـمــیـن دل را ز اســبــاب جــهــان بــرداشــتــم |
| *** | |
| گــر نـبــاشــد در مــیـان روی تــو، از یـک آه گــرم | آب را در دیـــده آیـــیـــنـــه خــــاکــــســــتــــر کـــنـــم |
| *** | |
| درین بـستـانسرا خود را چنان صائب سبـک کردم | کــه رنــگ چــهــره گــل را گــران پــرواز مــی بــیــنــم |
| *** | |
| گـر چـه هر گوشـه ای از کـنج دهانش گیر اسـت | بـوسـه را چـشـم بـه جـایی اسـت کـه مـن مـی دانم |
| *** | |
| فـیضـی کـه گـوشـه گـیر ز عـزلـت نـیافـتـه اسـت | از گــوشـــه هــای چـــشـــم ســـیــاه تـــو یــافـــتـــم |
| *** | |
| اینـجـا بـه خـواب غـفـلـت و آنـجـا بـه خـواب مـرگ | چـــون مــخـــمــل دوخـــوابـــه بـــه روی نــهــالــی ام |
| *** | |
| لــنـگــر نــکــرده ایـم چــو گــوهـر دریـن مــحــیـط | از بـــوســتــان دهــر چــو شــبـــنــم گــذشــتــه ایــم |
| *** | |
| ســــالـــم از ســــنـــگـــلـــاخ تــــن بــــه کـــنـــار | بـــــا هــــمــــه شــــیــــشــــه جـــــانــــی آمــــده ام |
| *** | |
| بــر ســیـنـه نـعـل و داغـم بــس لـالـه و گـل مـن | تــــا کــــی نـــگـــه چــــرانـــم در بــــاغ و راغ مـــردم؟ |
| *** | |
| اگـر ایـن رنـگ دارد خــنـده هـای شــرم بــیـزارش | گــل ایـن بــاغ خــواهــد بــر دمــاغ بــاغــبــان خــوردن |
| *** | |
| چـراغ زنـدگـی را مـی کـنـد مـسـتـغـنی از روغـن | زبــان خــویـش چــون خــورشــیـد بــر دیـوار مــالــیـدن |
| *** | |
| چـسـان در حـلقه آغوش گیرم شـوخ چـشـمی را | کـه از شـوخـی نگـین را از نگـین دان مـی کـند بـیرون |
| *** | |
| فـــتــــاده اســــت مـــرا کـــار بــــا خــــودآرایـــی | کـــز آب آیـــنـــه از چــــشــــم کــــرد خــــواب بــــرون |
| *** | |
| گر بـه این عـنوان کمان چـرخ خـواهد حـلقـه شـد | خـــنـــده ســـوفـــار گـــردد غـــنـــچـــه پـــیـــکـــان او |
| *** | |
| چــنــان کــه بــاده کــنــد پــشــت دار صــهـبــا را | ز خــــط پــــشــــت لــــب افــــزود نـــشــــائه لـــب او |
| *** | |
| افـــزود شـــوق بــــوســـه مـــرا از لـــبــــان تــــو | صـــــفـــــرای مـــــن زیــــاده شـــــد از نــــاردان تـــــو |
| *** | |
| مـی تــوانـد چــنـگ در فــتــراک زد خــورشــیـد را | از تــعــلـق هـر کـه چــون شــبــنـم ســبــکـبــار آمـده |
| *** | |
| شــمـع نـیـلـوفـر مـاتــم زده از شــعـلـه بــه ســر | ظـلـمـت انـدوخـت شـبـم بـس کـه ز هـجـران کـسـی |
| *** | |
| ز بـعـد مـرگ، کـسـی خـط بـه قـبـر مـا نـکـشـیـد | ز بـــهــر آن کـــه نــبـــودیــم در حـــســـاب کـــســـی |
گروه کتاب پایگاه خبری شاعر
منبع : درج
منبع : درج











