ای مـانـده ز مـقـصــد اصـلـی دور!آکـــــنــــده دمــــاغ، ز بـــــاد غـــــرور!از عـلـم رسـوم چـه مـی جـویـی؟انــدر طــلــبـــش، تـــا کــی پـــویــی؟…
| ای مـانـده ز مـقـصــد اصـلـی دور! | آکـــــنــــده دمــــاغ، ز بـــــاد غـــــرور! |
| از عـلـم رسـوم چـه مـی جـویـی؟ | انــدر طــلــبـــش، تـــا کــی پـــویــی؟ |
| تــا چــنــد زنــی ز ریـاضــی لــاف؟ | تــــا کــــی بــــافــــی هـــزار گـــزاف؟ |
| ز دوائر عــــشــــر و دقـــایـــق وی | هــرگــز نــبـــری، بــه حــقــایــق پــی |
| وز جــبــر و مـقـابــلـه و خــطــایـن | جــبــر نـقـصــت نـشــود فـی الـبــیـن |
| در روز پـسـیـن، کـه رسـد مـوعـود | نـــرســـد ز عـــراق و رهـــاوی ســـود |
| زایــل نــکــنــد ز تــو مــغــبـــونــی | نه «شـکل عـروس » و نه «مأمونی » |
| در قـبــر بــه وقـت سؤال و جــواب | نـفــعــی نـدهـد بــه تــو اســطــرلـاب |
| زان ره نــبـــری بـــه در مــقــصــود | فـلـسـش قـلـب اسـت و فـرس نـابـود |
| عـلـمـی بــطـلـب کـه تـو را فـانـی | ســـازد ز عـــلـــایــق جـــســـمــانــی |
| علمی بـطلب که بـه دل نور است | ســیـنـه ز تــجــلــی آن، طــور اســت |
| علمی که از آن چو شوی محظوظ | گـــردد دل تـــو لـــوح الـــمـــحـــفـــوظ |
| علمی بـطـلب که کتـابـی نیسـت | یعنی ذوقی اسـت، خـطـابـی نیسـت |
| عــلـمـی کــه نـســازدت از دونـی | مـــحـــتــــاج بــــه آلـــت قـــانـــونـــی |
| علمی بـطـلب که جـدالی نیسـت | حـالـی اسـت تـمام و مقـالی نیسـت |
| علمی که مجـادله را سبـب است | نـــورش ز چـــراغ ابـــولـــهــب اســـت |
| عـلمی بـطـلب که گزافـی نیسـت | اجــمـاعـیـســت و خــلـافـی نـیـسـت |
| عـلـمـی کـه دهـد بــه تـو جـان نـو | عـلـم عـشــق اســت، ز مـن بــشـنـو |
| بــه عـلـوم غـریـبــه تــفـاخـر چـنـد | زیـن گــفــت و شــنـود، زبــان در بــنـد |
| سـهل اسـت نحـاس که زر کـردی | زر کــن مـس خــویـش تــو اگـر مـردی |
| از جـفر و طـلسـم، بـه روز پـسـین | نـفـعـی نـرسـد بــه تـو ای مـسـکـیـن |
| بــگـذر ز هـمـه، بــه خـودت پــرداز | کــــــز پـــــــرده بـــــــرون نــــــرود آواز |
| آن عـــلـــم تـــو را کـــنـــد آمـــاده | از قــــیــــد جـــــهــــان کــــنــــد آزاده |
| عـشـق اسـت کـلـیـد خـزاین جـود | ســـــاری در هــــمــــه ذرات وجـــــود |
| غافل، تو نشسته بـه محنت و رنج | وانــدر بـــغـــل تـــو کـــلـــیــد گـــنـــج |
| جـز حـلقـه عـشـق مکـن در گوش | از عـشــق بــگـو، در عـشـق بــکـوش |
| علم رسمی همه خـسـران اسـت | در عـشــق آویـز، کـه عـلـم آن اســت |
| آن عــلــم ز تـــفــرقــه بـــرهــانــد | آن عــلــم تـــو را ز تـــو بـــســـتـــانــد |
| آن عــلــم تــو را بــبــرد بــه رهـی | کـز شــرک خــفــی و جــلـی بــرهـی |
| آن عـلـم ز چـون و چـرا خـالـیسـت | سـرچــشـمـه آن، عـلـی عـالـیـســت |
| سـاقی، قـدحـی ز شـراب السـت | که نه خستش پا، نه فشردش دست |
| در ده بـــه بــهــائی دلــخــســتــه | آن، دل بــه قــیــود جــهــان بــســتــه |
| تـــا کــنــده جـــاه ز پـــا شــکــنــد | ویـن تــخــتــه کــلــاه ز ســر فــکــنــد |
گروه کتاب پایگاه خبری شاعر
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