رباعیبا هر که نشستی و نشد جمع دلتوز تـو نرمید زحـمت آب و گـلـتزنهار ز صـحـبـتـش گـریزان می بـاشور نی نکنی روح عزیزان بـحـلتشعراز زمـــیـــن و زمــــان…
| رباعی | |
| با هر که نشستی و نشد جمع دلت | وز تـو نرمید زحـمت آب و گـلـت |
| زنهار ز صـحـبـتـش گـریزان می بـاش | ور نی نکنی روح عزیزان بـحـلت |
| شعر | |
| از زمـــیـــن و زمــــان بــــرون بــــردت | وز مـکـیـن و مـکـان بـرون بـردت |
| از مــی عــشــق بــیــخــودت ســازد | وز عــلــایــق مــجـــردت ســازد |
| دولــت صــحــبـــت چــنــیــن پــیــری | مس قـلب تـوراسـت اکـسـیری |
| تــا شــود زر مــس تــو زان اکــســیـر | بگسل از خویش و دامن آن گیر |
| بـــر در او مـــقـــیـــم و قـــائم بـــاش | تـا بـود جـان بـجـا مـلـازم بــاش |
| حــرف خــود بـــر تـــراش روز بـــه روز | سـبـق فقر و درس عشـق آموز |
| تـــــا کـــــه آیــــد ز فـــــر دولـــــت او | نسبـت جـذب عشق بـر تـو فرو |
| گــر چـــه عـــاریــت اســـت اول کــار | مـلـک گــردد در آخــر از تــکــرار |
| چــیـســت تــکـرار آنـکـه جــذب درون | چـون شود کم ز شـغل گوناگون |
| آوری ســــوی پــــیــــر روی نــــیــــاز | بــه سـر رشـتـه خـود آیـی بــاز |
| پــــیـــش آن آفـــتــــاب از ســــر نـــو | پـسـت گـردی بــرای یـک پــرتـو |
| تـــا فــتــد بـــر تــو پـــرتــوی زان نــور | افـتـی از گفت و گوی عـالم دور |
| هـمـچـنـین مـی کـن این وظـیفـه ادا | مــــرة بــــعــــد مــــرة اخــــری |
| تــا شـود راسـخ آن صـفـت زانـســان | کــه نــبـــاشــد زوال آن آســان |
گروه کتاب پایگاه خبری شاعر
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