در خــانـه دل عــشــق تــو مــجــمـع داردو از دادن جـــان کــار تـــو مــقــطــع دارددر شـعـر تــخـلـص بــتــو کـردم کـه وجـودنـظـمـیسـت کـه از روی تـ…
| در خــانـه دل عــشــق تــو مــجــمـع دارد | و از دادن جـــان کــار تـــو مــقــطــع دارد |
| در شـعـر تــخـلـص بــتــو کـردم کـه وجـود | نـظـمـیسـت کـه از روی تـو مـطـلـع دارد |
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| ای مـن هـمـه بـد کـرده و دیـده ز تـو نـیک | بـد گـفـتـه همه عـمر و شـنیده زتـو نیک |
| حــد بــدی و غــایــت نــیـکــی ایـنــســت | کـز مـن بــتـوبـد بـمـن رسـیـده زتـونـیـک |
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| بـرکـرده خـویـشـتـن چـو بـگـمـارم چـشـم | بـر هـم زدن از تـرس نـمـی یارم چـشـم |
| ای دیده شـوخ بـین کـه من چـندین سـال | بـد کـردم و نیکی از تـو میدارم چـشـم ! |
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| کـردم هـمـه عـمـر آنـچـه نـمـی بـایـدکـرد | از کــرده او حـــذر نــمــی شـــایــد کــرد |
| امــــروز چــــنـــیـــنـــم و نـــدانـــم فــــردا | تــا بــا مـن بــیـچــاره چــه فـرمـایـد کـرد |
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| ای جـــوهــر دیــنــت بـــزرو ســـیــم گــرو | بـــانــقـــد نـــبـــهــر نـــزد صـــراف مـــرو |
| روســکـه بــدل کـن کـه در آن دارالـضــرب | ایـن نــاســره دیـنــار تــو نـرزد بــدو جــو |
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| ای نـــور تــــو آمــــده نــــقــــاب روح تــــو | خــورشــیــد زکــاتــی ز نــصــاب رخ تـــو |
| هر دل کـه هوای تـو بـر و سـایه تـو فـگـند | در ذره بــــبــــیـــنـــد آفـــتــــاب رخ تــــو |
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| ای ســوخــتــه شــمــع مـه ز تــاب رویـت | وز خـــط تـــو افـــزون شـــده آب رویـــت |
| ایـن طـرفـه کـه دل گـرم نـشـد بـا تـو مـرا | جـــــز وقـــــت زوال آفـــــتـــــاب رویــــت |
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| ای نقطه دهن خـطـت عجـب دایره اسـت | وز مـشــک تــرابــگـرد لـب دایـره اســت |
| بـر روز رخـت چـو صـبـح صـادق پـیـداسـت | کین خـط تـو گرد مه ز شـب دایره اسـت |
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| هر بـوسـه کز آن تـنگ دهان می خـواهی | عمریست که از معدن جان می خواهی |
| در ظــلــمــت خــط او نــگــر زیــر لــبـــش | از آب حــیـوه اگـر نـشـان مـی خــواهـی |
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| خط تو که ننوشت کسی زآن سان خوش | چون شمع وصال در شب هجـران خوش |
| آورد بــبــنــده شــاهـدی خــوش گــرچــه | شـاهد کـه خـط آرد نـبـود چـندان خـوش |
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| جـــعـــفـــرکـــه زرخ مــاه تـــمــامــی دارد | در شـهـر بــلـطـف وحــسـن نـامـی دارد |
| بــا لــشــکــر حــســن در مـیـان خــوبــان | زآنـســت مـظــفــر کـه حــســامـی دارد |
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| قــال بــعــد قـصــیـده ردیـفــهـا انـگـشــت | طبـعم که چـو لعل بـار گوهر سخـنسـت |
| چون پـسته تـنگ دوست شکر سخنست | در شـعر چـنانسـت که چـندین انگشـت |
| بـنمـود زدسـتـی کـه مـرا در سـخـنـسـت | |
| عـشـقـت جــگـرم خـورد و بــدل روی آورد | رنـــگ از رخ مـــن بـــرد زتـــو بـــوی آورد |
| پـــای از در تـــو بـــاز نــگـــیــرم کـــه مــرا | سـودای تـوسـر گشـتـه درین کـوی آورد |
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| گــر زان تــوام هـردو جــهـانــم بــســتــان | بــاکـی نـبــود سـود و زیـانـم بــســتــان |
| بــاز آی بــپـرسـش و بــبـیـن چـشـم تـرم | لب بـرلب خـشـکـم نه و جـانم بـسـتـان |
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| عـشـقت که بـدل گرفتـه ام چـون جـانش | در دسـت و بـصـبـر مـی کـنـم درمـانـش |
| وز غـــایــت عـــزت کـــه خـــیـــالـــت دارد | در خــانـه چــشــم کــرده ام پــنـهـانـش |
| *** | |
| ایـام چــو بــســت کــهـربــا بــر دســتــت | بـی جـرم بـریـخـت خـون مـا بـر دسـتـت |
| سـلـطـان غـمـت خـنجـر خـود سـوهان زد | تـا کشـتـه شـود چـو من گدا بـردسـتـت |
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| در دیــــدن ایـــن مــــدیـــنــــه زمــــزم آب | از مکـه اگر سـعـی کـنی هسـت صـواب |
| زیــــرا کـــــه درو مــــقـــــام دادر امـــــروز | رکـنـی کـه ازو کـعـبـه دلـهـاسـت خـراب |
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| دل در طــلــب تــو خــســتـــگــیــهــا دارد | کــارش زغــم تــو بـــســتــگــیــهــا دارد |
| هر چـند که پـشت لشکر هستـیم اوست | زان روی بــسـی شـکـســتــگـیـهـا دارد |
| *** | |
| دل را چـو بــعـشـق تــوسـپــردم چــکـنـم | دل دادم و انـــدوه تـــوبـــردم چـــکـــنــم |
| من زنده بـعـشـق تـوام ای دوسـت و لیک | از آرزوی روی تــــو مــــردم چــــکــــنـــم |
| *** | |
| ای کـرده غـم عـشـق تــو غـمـخـواری دل | درد تــو شــده شــفــای بـــیــمــاری دل |
| رویـت کـه بــخــواب درنـدیـســت کـسـش | دیـــده نـــشـــود مـــگـــر بـــیـــداری دل |
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| آنـــی کـــه مـــنـــورســـت آفـــاق از تــــو | مـحـروم بــمـانـدم مـن مـشـتــاق از تــو |
| این مـحـنـت نـو نـگـر کـه در خـلـوت وصـل | تــو بــاد گـری جـفـتـی ومـن طـاق از تـو |
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| شب نیسـت که از غمت دلم جـوش نکرد | واز بــهـر تــو زهـر انــدهـی نـوش نـکــرد |
| ای جـــان جــهــان هــیــچ نــیــاوردی یــاد | آن را کــه تــراهــیــچ فــرامــوش نــکــرد |
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| ای ســلــســلـه عــشــق تــو انـدر پــایـم | بـنـدیـسـت ز گـیـسـوی تـو بــرهـر پـایـم |
| ایـن شــعــرا اگـر بــدســتــت افـتــد روزی | گــردن مـکــش وبــنـه ســری بــر پــایـم |
گروه کتاب پایگاه خبری شاعر
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