جـــز نــقــش تـــو در نــظـــر نــیــامــد مــا راجـــز کــوی تـــو رهــگــذر نــیــامــد مــا راخـواب ارچـه خـوش آمـد همـه را در عـهـدتحــقــا کــه …
| جـــز نــقــش تـــو در نــظـــر نــیــامــد مــا را | جـــز کــوی تـــو رهــگــذر نــیــامــد مــا را |
| خـواب ارچـه خـوش آمـد همـه را در عـهـدت | حــقــا کــه بــه چــشــم در نـیـامـد مــا را |
| *** | |
| بـــر گــیــر شـــراب طـــرب انــگــیــز و بـــیــا | پـنـهـان ز رقـیـب سـفـلـه بــسـتـیـز و بـیـا |
| مـشـنـو سـخـن خـصـم کـه بـنـشـین و مـرو | بـشـنـو ز مـن این نـکـتـه کـه بـرخـیز و بـیا |
| *** | |
| گـفـتــم کـه لـبــت، گـفـت لـبــم آب حــیـات | گـفـتـم دهـنـت، گـفـت زهـی حـب نـبـات |
| گـفـتــم ســخــن تــو، گـفـت حــافـظ گـفـتــا | شــادی هـمـه لـطــیـفـه گـویـان صــلـوات |
| *** | |
| ماهی کـه قـدش بـه سـرو می ماند راسـت | آیینـه بـه دسـت و روی خـود مـی آراسـت |
| دسـتـارچـه ای پــیـشـکـشـش کـردم گـفـت | وصـلم طـلبـی زهی خـیالی که تـوراسـت |
| *** | |
| مــن بــاکــمــر تــو در مــیــان کــردم دســت | پـنداشـتـمـش کـه در میان چـیزی هسـت |
| پـیـداسـت از آن مـیـان چـو بــربــسـت کـمـر | تـا من ز کمر چـه طـرف خـواهم بـربـسـت |
| *** | |
| تـو بـدری و خـورشید تـو را بـنده شده سـت | تـا بـنده تـو شده ست تـابـنده شده ست |
| زان روی کــــه از شـــــعــــاع نــــور رخ تـــــو | خـورشـید منیر و مـاه تـابـنده شـده سـت |
| *** | |
| هــر روز دلــم بـــه زیــر بـــاری دگــر اســـت | در دیـده مـن ز هـجــر خــاری دگــر اســت |
| مـن جــهـد هـمـی کــنـم قــضــا مـی گـویـد | بــیـرون ز کــفــایـت تــو کــاری دگـراســت |
| *** | |
| مـاهـم کـه رخــش روشـنـی خــور بــگـرفـت | گــرد خــط او چــشــمـه کــوثــر بــگـرفــت |
| دلــهــا هــمــه در چــاه زنــخــدان انــداخــت | وآنـگـه ســر چــاه را بــه عـنـبــر بــگـرفـت |
| *** | |
| امـشـب ز غـمـت میان خـون خـواهم خـفـت | وز بـسـتـر عـافـیـت بــرون خـواهـم خـفـت |
| بــاور نــکــنــی خــیــال خــود را بــفــرســت | تـا در نگرد که بـی تـو چـون خواهم خـفت |
| *** | |
| نـی قـصـه آن شـمـع چــگـل بــتــوان گـفـت | نـی حـال دل سـوخـتـه دل بــتــوان گـفـت |
| غـم در دل تـنگ من از آن اسـت کـه نیسـت | یک دوسـت که بـا او غـم دل بـتـوان گفـت |
| *** | |
| اول بــــــه وفـــــا مـــــی وصـــــالـــــم درداد | چـون مـسـت شـدم جـام جـفـا را سـرداد |
| پــــــر آب دو دیـــــده و پــــــر از آتــــــش دل | خــــاک ره او شـــدم بــــه بــــادم بــــرداد |
| *** | |
| نــی دولـــت دنــیــا بـــه ســـتـــم مــی ارزد | نـی لــذت مــســتــی اش الــم مــی ارزد |
| نــه هـفــت هــزار ســالــه شــادی جــهــان | ایـن مــحــنـت هـفــت روزه غــم مـی ارزد |
| *** | |
| هـر دوســت کـه دم زد ز وفـا دشـمـن شــد | هــر پـــاکــروی کــه بـــود تــردامــن شــد |
| گـویـنـد شـب آبـسـتـن و ایـن اسـت عـجـب | کــاو مــرد نــدیـد از چــه آبــســتــن شــد |
| *** | |
| چــون غــنــچــه گــل قــرابـــه پـــرداز شــود | نـرگـس بــه هـوای مـی قـدح ســاز شـود |
| فــارغ دل آن کــســی کــه مــانـنــد حــبــاب | هـم در ســر مــیـخــانـه ســرانــداز شــود |
| *** | |
| بــا مــی بــه کــنــار جــوی مــی بــایـد بــود | وز غــصــه کــنـاره جــوی مـی بــایـد بــود |
| ایـن مـدت عــمـر مـا چــو گـل ده روز اســت | خــنـدان لـب و تــازه روی مـی بــایـد بــود |
| *** | |
| ایــن گــل ز بـــر هــمــنــفــســی مــی آیــد | شــادی بــه دلــم از او بــســی مــی آیـد |
| پــیـوســتــه از آن روی کـنـم هـمـدمـی اش | کــز رنـگ وی ام بــوی کــســی مــی آیـد |
| *** | |
| از چــرخ بــه هــر گــونــه هــمــی دار امــیـد | وز گــردش روزگـــار مــی لــرز چـــو بـــیــد |
| گـفــتــی کــه پــس از ســیـاه رنـگـی نـبــود | پـس موی سـیاه من چـرا گـشـت سـفـید |
| *** | |
| ایــام شـــبـــاب اســـت شـــراب اولـــیــتـــر | بـــا ســبــز خــطــان بــاده نــاب اولــیــتــر |
| عـالم همه سـر بـه سـر ربـاطـیسـت خـراب | در جـــای خـــراب هــم خـــراب اولــیــتـــر |
| *** | |
| خــوبـــان جــهــان صــیــد تــوان کــرد بــه زر | خوش خوش بر از ایشان بتوان خورد به زر |
| نـرگـس کـه کـلـه دار جــهـان اسـت بــبــیـن | کــاو نــیــز چـــگــونــه ســر درآورد بـــه زر |
| *** | |
| ســـیــلــاب گــرفـــت گــرد ویــرانــه عـــمــر | وآغـــاز پـــری نــهــاد پـــیــمــانــه عـــمــر |
| بیدار شو ای خواجه که خوش خوش بـکشد | حـــمــال زمــانــه رخــت از خــانــه عــمــر |
| *** | |
| عـــشـــق رخ یـــار بــــر مـــن زار مـــگـــیـــر | بــر خــســتــه دلــان رنـد خــمــار مــگــیـر |
| صـوفـی چــو تــو رســم رهـروان مـی دانـی | بــر مــردم رنــد نـکــتــه بــســیـار مــگــیـر |
| *** | |
| در ســـنــبـــلــش آویــخـــتـــم از روی نــیــاز | گــفــتـــم مــن ســودازده را کــار بـــســاز |
| گــفــتــا کــه لـبــم بــگــیـر و زلـفــم بــگــذار | در عــیـش خــوش آویـز نـه در عــمــر دراز |
| *** | |
| مـــردی ز کـــنـــنـــده در خـــیـــبــــر پــــرس | اســرار کــرم ز خــواجـــه قــنــبـــر پـــرس |
| گـر طـالـب فـیـض حـق بــه صـدقـی حــافـظ | سـر چـشـمـه آن ز سـاقـی کـوثــر پــرس |
| *** | |
| چـشم تـو که سحـر بـابـل اسـت اسـتـادش | یــا رب کــه فــســونــهــا بــرواد از یــادش |
| آن گـوش کـه حـلـقـه کـرد در گـوش جــمـال | آویـــزه در ز نــــظــــم حــــافــــظ بــــادش |
| *** | |
| ای دوســت دل از جــفـای دشــمـن درکـش | بـــا روی نــکــو شـــراب روشـــن درکـــش |
| بــا اهـل هـنــر گــوی گــریـبــان بــگــشــای | وز نـــااهـــلـــان تـــمـــام دامـــن درکـــش |
| *** | |
| مـاهـی کـه نـظــیـر خــود نـدارد بــه جــمـال | چون جـامه ز تـن بـرکشد آن مشکین خال |
| در ســیـنــه دلــش ز نــازکــی بــتــوان دیــد | مـــانــنـــده ســـنـــگ خـــاره در آب زلـــال |
| *** | |
| در بـــاغ چـــو شـــد بـــاد صــبـــا دایــه گــل | بــربــســت مــشــاطــه وار پــیــرایـه گــل |
| از سـایه بـه خـورشـیـد اگـرت هـسـت امـان | خـورشـیـد رخـی طـلـب کـن و سـایه گـل |
| *** | |
| لــب بـــاز مــگــیــر یــک زمــان از لــب جــام | تــا بــسـتــانـی کـام جــهـان از لـب جــام |
| در جام جهان چو تلخ و شیرین به هم است | ایــن از لــب یــار خــواه و آن از لــب جـــام |
| *** | |
| در آرزوی بــــــوس و کــــــنــــــارت مــــــردم | وز حــــســــرت لـــعــــل آبــــدارت مـــردم |
| قــــصــــه نـــکـــنـــم دراز کـــوتــــاه کـــنـــم | بــــازآ بــــازآ کــــز انــــتــــظــــارت مــــردم |
| *** | |
| عــــمــــری ز پـــــی مــــراد ضـــــایــــع دارم | وز دور فــلــک چــیـســت کــه نـافــع دارم |
| بـا هر کـه بـگـفـتـم کـه تـو را دوسـت شـدم | شـد دشـمـن مـن وه کـه چـه طـالـع دارم |
| *** | |
| مــن حــاصــل عــمــر خــود نـدارم جــز غــم | در عــشــق ز نـیـک و بــد نـدارم جــز غـم |
| یــک هـــمـــدم بـــاوفـــا نـــدیـــدم جـــز درد | یــک مــونــس نــامـــزد نــدارم جـــز غـــم |
| *** | |
| چــون بــاده ز غـم چــه بــایـدت جــوشـیـدن | بــا لـشــگـر غـم چــه بــایـدت کـوشـیـدن |
| ســبــز اســت لـبــت ســاغـر از او دور مـدار | مـی بـر لـب سـبـزه خـوش بـود نـوشـیدن |
| *** | |
| ای شــرمــزده غــنــچـــه مــســتـــور از تـــو | حــیـران و خــجــل نـرگـس مـخـمـور از تــو |
| گــل بـــا تـــو بـــرابـــری کـــجـــا یــارد کـــرد | کـــاو نـــور ز مـــه دارد و مـــه نـــور از تـــو |
| *** | |
| چـشـمـت کـه فـسـون و رنگ می بـازد از او | افـسـوس کـه تــیـر جـنـگ مـی بــارد از او |
| بــس زود مـلـول گـشـتــی از هـمـنـفـســان | آه از دل تــو کــه ســنــگ مــی بــارد از او |
| *** | |
| ای بــاد حــدیــث مــن نــهــانــش مــی گــو | ســر دل مــن بــه صــد زبــانـش مـی گــو |
| مـی گـو نـه بــدانـســان کـه مـلـالـش گـیـرد | مـی گـو سـخـنـی و در مـیـانـش مـی گـو |
| *** | |
| ای ســـایــه ســنــبـــلــت ســمــن پـــرورده | یــــاقــــوت لــــبـــــت در عــــدن پــــرورده |
| هـمـچــون لـب خــود مـدام جــان مـی پــرور | زان راح کـه روحــیـســت بــه تــن پــرورده |
| *** | |
| گــفــتــی کــه تــو را شــوم مـدار انـدیـشــه | دل خـوش کـن و بـر صـبـر گـمـار انـدیشـه |
| کو صبـر و چـه دل، کآنچـه دلش می خـوانند | یـک قـطـره خــون اسـت و هـزار انـدیـشـه |
| *** | |
| آن جـــام طــرب شــکــار بـــر دســـتـــم نــه | وان ســاغــر چــون نـگـار بــر دســتــم نـه |
| آن مـی کـه چـو زنـجــیـر بــپــیـچـد بــر خـود | دیــوانــه شــدم بـــیــار بـــر دســتـــم نــه |
| *** | |
| بــا شـاهـد شـوخ شـنـگ و بــا بــربـط و نـی | کـنـجـی و فـراغـتـی و یک شـیـشـه مـی |
| چــون گــرم شــود ز بـــاده مــا را رگ و پــی | مــنـت نــبــریـم یـک جــو از حــاتــم طــی |
| *** | |
| قـسـام بـهـشـت و دوزخ آن عـقـده گـشـای | مـــا را نـــگـــذارد کـــه درآیـــیـــم ز پــــای |
| تــا کــی بــود ایـن گــرگ ربــایـی، بــنـمــای | سـرپـنجـه دشـمن افـکن ای شـیر خـدای |
| *** | |
| ای کــاش کــه بـــخـــت ســازگــاری کــردی | بــــا جــــور زمـــانـــه یـــار یـــاری کـــردی |
| از دســت جــوانــی ام چــو بـــربــود عــنــان | پـــیـــری چـــو رکـــاب پـــایـــداری کـــردی |
| *** | |
| گــر هـمــچــو مـن افــتــاده ایـن دام شــوی | ای بــس کـه خــراب بــاده و جــام شــوی |
| مـا عـاشـق و رند و مسـت و عـالـم سـوزیم | بــا مـا مـنـشــیـن اگــر نـه بــدنـام شــوی |
گروه کتاب پایگاه خبری شاعر
منبع : درج
منبع : درج











